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कानून की लाठी

कानून की लाठी

बच्चों के लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर देने वाले पैरंट्स उम्र के अंतिम पड़ाव पर अपने ही बच्चों की उपेक्षा से परेशान हैं। ऐसे में असम विधानसभा ने बुजुर्गों के हित में एक नया बिल पास कर उन्हें राहत देने की कोशिश की है। बुजुर्गों की हालत और इस बिल की जरूरत  पढ़िए.

असम विधानसभा ने हाल में एक बिल ‘असम एम्प्लॉयीज पैरंट्स रेस्पॉन्सिबिलिटी ऐंड नॉर्म्स फॉर अकाउंटैबिलिटी ऐंड मॉनिटरिंग बिल-2017’ पास किया है। इसे असम एम्पलॉयीज प्रणाम बिल भी कहा जाता है। इसके अनुसार अगर कोई नौकरीपेशा व्यक्ति अपने पैरंट्स की देखभाल सही तरीके से नहीं करता तो हर महीने एक तय रकम उसकी सैलरी से काटकर बुजुर्ग मां-बाप को दे दी जाएगी ताकि उनका गुजारा हो सके। फिलहाल यह कानून सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिए है, लेकिन असम के वित्त मंत्री हेमंत विस्वा शर्मा का कहना है कि जल्दी ही इसे प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों पर भी लागू किया जाएगा।

असम सरकार के अनुसार, यह कदम ओल्ड ऐज होम से मिल रही बड़ी संख्या में उन शिकायतों के बाद किया गया है, जिनके अनुसार अच्छा खासा कमाने वाले लोग भी अपने मां-बाप को ओल्ड ऐज होम में छोड़कर चले जाते हैं। असम सरकार के इस फैसले ने देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। जहां एक बड़ा तबका सरकार के इस फैसले का समर्थन कर रहा है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी जो इसकी आलोचना कर रहे हैं।

बड़ी उम्र की बड़ी जरूरतें
जब उनको देखभाल की जरूरत पड़ती है तो उनके पास कोई नहीं होता। कुछ स्टडीज का पिछले साल का औसत आंकड़ा यह है कि देश 10 में से 6 बुजुर्गों को उनके बच्चों ने अलग रहने पर मजबूर किया हुआ है। 37 प्रतिशत बुजुर्गों ने बताया कि उनके बच्चे ही उनके साथ बदसलूकी करते हैं तो 20 फीसदी ने कहा कि उनकी स्थिति लगभग बंधकों जैसी है और उनके बच्चे उन्हें लोगों से मिलने-जुलने नहीं देते। 13 प्रतिशत बुजुर्ग तो ऐसे थे, जिन्हें उनके बच्चे बुनियादी जरूरत की चीजें भी नहीं मुहैये कराते। इतने ही फीसदी बुजुर्गों ने शिकायत की कि उनका जिगर का टुकड़ा गाली गलौच और टॉर्चर करता है।

दुखद यह है कि बुजुर्गों के साथ बदसलूकी की सीमा सामाजिक या आर्थिक आधारों से बंधी हुई नहीं है। ऐसा नहीं है कि गरीब बुजुर्गों के साथ ही समस्या हो, अमीर बुजुर्गों की भी शिकायत है कि उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता है। हाल ही में मशहूर उद्योगपति विजयपत सिंहानिया ने एक इंटरव्यू में यह कहकर लोगों को हैरान कर दिया कि बेटे ने उनके पास गुजारे लायक भी पैसा नहीं छोड़ा है और यह कि वह सड़क पर आ गए हैं। देश में बुजुर्गों की क्या हालत है, सिंहानिया इसके मिसाल हैं।

समस्या पैसे से अलग भी है
जाहिर है कि बुजुर्गों की समस्या सिर्फ आर्थिक नहीं है। अगर सरकार बच्चों की सैलरी काटकर बुजुर्गों को दे देती है तो भी बुजुर्गों की हालत बहुत सुधरने वाली नहीं। सरकार मेंटनेंस दिला सकती है, लेकिन यह समस्या के मात्र एक पहलू का समाधान है। दूसरे और बड़े पहलू भी हैं। बुजुर्गों की समस्या मुख्य रूप से चार तरह की है:

बदसलूकी: हमने जितने भी बुजुर्गों से बात की ज्यादातर इस बात से बेहद दुखी थे कि उनके अपने ही बच्चे उनका तिरस्कार करते हैं, गाली-गलौच करते हैं और मेंटल टॉर्चर करते हैं। उनका मानना है कि भूखे रह सकते हैं, बीमारी का दर्द सह सकते हैं, लेकिन अपनों का दिया दर्द सहना मुश्किल होता है।

पैसे की तंगी: यह बड़ी समस्या है। जो नौकरी में थे, उनके लिए स्थिति थोड़ी ठीक है। पेंशन से उनका काम किसी तरह चल जाता है। लेकिन जिन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिलती या वे सरकार से मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन के भरोसे हैं, उनकी स्थिति खराब है। एक तो पेंशन कम है, ऊपर से वह अनियमित भी है। ऐसे में उनकी स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

सुरक्षा: नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के अनुसार एक लाख बुजुर्गों की आबादी वाली दिल्ली में 2015 में बुजुर्गों के साथ अपराध के 1248 मामले दायर हुए। इनमें हत्या, लूटपाट, मारपीट के मामले अधिक हैं। जाहिर है, ये वे मामले हैं जो थाने तक पहुंच पाए। थाने तक न पहुंचने वाले मामले का कोई रेकॉर्ड नहीं है और ये रेकॉर्ड में आए मामलों से कई गुना ज्यादा हैं। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में औसतन छह बुजुर्गों की हत्या रोज होती है और इसका कोई ठोस समाधान नहीं है। दिल्ली पुलिस का बुज़ुर्गों की सुरक्षा के लिए बना सीनियर सिटिजन सेल नाकाम साबित हो रहा है। अपराधियों के लिए अकेले रह रहे बुजुर्ग आसान शिकार हैं। यहां तक कि अपने नाते-रिश्तेदारों से भी वे सुरक्षित नहीं हैं। जाहिर है, वे लचर कानून व्यवस्था की भेंट चढ़ रहे हैं। पैसा होने के बावजूद वे नौकर-चाकर नहीं रख सकते क्योंकि उन्हें रखना खतरे से खाली नहीं है।

सेहत: बेतहाशा बढ़ रहा मेडिकल बिल और लाइलाज बीमारियां बुजुर्गों की हालत खराब कर रही हैं। यहां एक्सपर्ट पूरी तरह से सरकार की नाकामी को इसकी वजह मानते हैं। भारी भीड़ और सुविधाओं के अभाव की वजह से सरकारी अस्पताल किसी काम के नहीं हैं, तो प्राइवेट अस्पतालों का बिल किसी के काबू में नहीं है। ऐसे में बच्चे भी पैरंट्स को समुचित इलाज करवाने में असमर्थ रहते हैं।

दिल्ली के अकेले रहने वाले तमाम बुजुर्ग ऐसे हैं जो घर-बार छोड़कर ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट हो गए हैं, क्योंकि घर में वे खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक ओल्ड एज होम के केयर टेकर कहते हैं, ‘यहां रह रहे ज्यादातर बुजुर्ग गजेटेड अफसर रह चुके हैं। बच्चे उन्हें अपने साथ नहीं रखते या फिर उन्होंने अपने को बच्चों से दूर कर लिया है। तमाम लोगों के घर दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में हैं, लेकिन उनके नसीब में वृद्धाश्रम ही लिखा है। वे यहां इसलिए हैं क्योंकि यहां समय पर सुरक्षा के साथ-साथ खाने-पीने और जरूरत पड़ने पर मेडिकल केयर की गारंटी है।’

क्या कानून समाधान है?
सवाल है कि अगर बेटे अपने पैरंट्स की देखभाल नहीं करते तो उनकी सैलरी में से मेंटनेंस काटना समस्या का समाधान है‌? एक्सपर्ट इसे लेकर बंटे हुए नजर आते हैं। कुछ मानते हैं कि इससे बच्चों पर प्रेशर होगा कि वे अपने बुजुर्ग और लाचार पैरंट्स की देखभाल करें। यह एक तरह से सामाजिक धिक्कार की तरह भी होगा कि फलाने की सैलरी इसलिए काट ली गई कि वह अपने पैरंट्स की देखभाल नहीं करता है। ऐसे में इस स्थिति से बचने के लिए लोग अपने पैरंट्स की केयर करेंगे और पैरंट्स को कानूनी मदद की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री नरेंद्र गौतम कहते हैं, ‘अपने पैरंट्स की देखभाल करना बच्चों का फर्ज है। एक बेहतर समाज के लिए यह जरूरी है। दिल्ली में डीएम के लेवल पर ही बुजुर्गों को मदद देने की पूरी व्यवस्था है। यहां ट्राइब्यूनल है जिसमें अपने बच्चों के हाथों किसी भी तरह से प्रताड़ित बुजुर्गों को इंसाफ दिलाया जाता है। दिल्ली सरकार की कोशिश है कि बुजुर्गों को पूरी सुरक्षा और संरक्षा मिले। हम असम के बिल का ड्राफ्ट भी मंगाएंगे और ऐसे किसी कानून पर विचार करेंगे।’

दिल्ली में ओल्ड ऐज होम ‘गोधूलि’ चलाने वाले रिटायर्ड कर्नल गुलवीर सिंह कहते हैं, ‘कानून तो अभी भी है। मां-बाप को मेंटनेंस देने के लिए बाध्य हैं बच्चे, लेकिन कहां पालन हो रहा? फिर बड़ी बात यह है कि अगर कोई बेटा नौकरी की कमाई से अपने बीवी-बच्चों का पेट ठीक से नहीं पाल पा रहा तो भला सरकार उसे पैरंट्स की देखभाल के लिए कैसे मजबूर कर पाएगी? बेहतर होगा इन कानूनों के बजाय सरकार बुजुर्गों के रहने, खाने-पीने और इलाज की पुख्ता व्यवस्था करे। वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल सरकार की भी जिम्मेदारी है और इससे उसे भागना नहीं चाहिए।’

पिछले साल भर से अपने पैतृक संपत्ति में हिस्सा पाने के लिए विनोद सिंह अपने पिता के खिलाफ केस लड़ रहे हैं। इस बिल को लेकर वह कहते हैं, ‘मेरे पैरंट्स ने सारा पैसा बेटियों पर उड़ा दिया। हमारा पैतृक घर है, लेकिन मैं अपने परिवार के साथ किराए पर रहने को मजबूर हूं। अब मेरे पैरंट्स बीमार और लाचार हो गए हैं तो बहनों ने कन्नी काट ली और वे उम्मीद कर रहे हैं कि मैं उनकी देखभाल करूं। आखिर मैं क्यों देखभाल करूं? कोई कानून अगर मुझे उनकी देखभाल के लिए मजबूर करेगा तो यह मेरे साथ अन्याय होगा। कानून बनाने से पहले सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उससे प्रभावित पक्ष के साथ नाइंसाफी न हो।’

समाज सेवा से जुड़े कुछ अनुभवी लोग यह स्वीकार करते हैं कि दिक्कत बुजुर्गों की तरफ से भी है। उनकी मानें तो सीन कुछ ऐसा है कि बुजुर्ग परिस्थितियों से समझौते को जरा भी तैयार नहीं होते। जनरेशन गैप और बदलती दुनिया से वे कदम नहीं मिला पाते या यों कहें कि मिलाना ही नहीं चाहते। ऐसे में बच्चों पर वे बोझ बन रहे हैं। हालत यह है कि घर से ज्यादा पैसा खर्च कर सक्षम बच्चे मां-बाप को ओल्ड ऐज होम में छोड़ आते हैं। इसमें उनकी ज्यादा गलती भी नहीं है। रोज-रोज की किचकिच से अच्छा है कि ऐसा रास्ता निकाला जाए जिसमें बुजुर्ग पैरंट्स की पूरी देखभाल हो और बच्चे भी सुकून से रहे।

फिर लोगों की चिंता बुजुर्गों की मानसिक स्थिति और उसके दुरुपयोग की भी है। कांति चौधरी एक सरकारी महकमे में संयुक्त सचिव स्तर की अधिकारी हैं। परिजनों के बीच वह सास-ससुर के बेहतर देखभाल के लिए जानी जाती हैं। उनका मानना है कि ऐसे नाजुक संबंधों के बीच कानून के लिए कोई जगह नहीं है। यह रिश्ता इमोशनल है और इसे इमोशन से ही चलने देना चाहिए, किसी कानून से नहीं। वह कहती हैं, ‘मेरे सास-ससुर 80 साल से ज्यादा उम्र के हैं। दिमाग अब थकने लगा है उनका। इतनी सेवा करने के बावजूद वे हर आने-जाने वाले को बताते हैं कि हम उनकी देखभाल नहीं करते। ऐसे में कानून अगर मुझे परेशान करेगा तो यह इंसानियत से भरोसा उठने जैसा होगा। मुझे नहीं लगता कि कानून को हस्तक्षेप करने की जरूरत है। इससे नुकसान ही होगा।’

समाजशास्त्री बद्री नारायण इस बिल से सहमत हैं। वह कहते हैं, ‘जरूरत पड़ने पर ही कानून बनाए जाते हैं। आज के जमाने में ऐसे कानून की जरूरत है भी। अगर कोई कहता है कि ऐसे कानून से संबंधों की मिठास खत्म होगी तो मेरा कहना है कि इससे क्या फर्क पड़ता है? बेटे से भले ही संबंध खत्म हो जाएंगे, लेकिन बुजुर्गों की जिंदगी तो सुकून वाली हो जाएगी।’

बहरहाल, फैसले का समर्थन कर रहे लोगों का तर्क है कि सोशल सिक्युरिटी के घोर अभाव वाले इस देश में बुजुर्गों को इस कानून से बड़ी राहत मिलेगी। दूसरी ओर, जो लोग इस बिल का विरोध कर रहे हैं, उनका तर्क है कि सिर्फ पैसा दे देने से बुजुर्गों का कल्याण नहीं होगा। कानून का डंडा पैसा दिला सकता है, प्रॉपर केयर नहीं। बुजुर्गों को पैसे से ज्यादा अपनों के प्यार और सेवा की जरूरत होती है और वह कानून से संभव नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में कानून को बीच में नहीं पड़ना चाहिए।

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